घिर जाओ कभी अंधेरों में तो शमा उम्मीद की जलाये रखना,
कि मिल जाती है तपिश दिल की ठंडक को, दूर के चिराग से भी....

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चाहा था एहसाने करम उसका, क्यों कर सितम दे गया,
ख़ुशी बन के आया था, दर्द-ऐ-ज़ख्म दे गया.
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चाहता मैं भी नहीं था कि दर्द हो किसी को,
एक आह भरी थी, वो ज़ख्म खा बैठे..
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गुजर जाने दे ज़िंदगी इसी भरम के साथ,
गुमां बस इतना रहे, उसने वफ़ा की थी।
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- जनार्दन साबत 'मुरली '
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