शेर
चुप रहते लब सी लेते तो अच्छा था..
हर ग़म पे मुस्कुरा देते तो अच्छा था..
डुबो दी गैर के हाथों, कश्ती अपनी,
नाखुदा खुद को बनाते तो अच्छा था..
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पलट कर देखना भी अब गुनाह लगता है,
यादों को कुरेदना भी अब गुनाह लगता है,
कुछ आदत सी पद गई है तनहाइयों की,
दोस्तों से मिलना भी अब गुनाह लगता है ..
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कुछ पाने की खुशी कुछ खोने का ग़म,
ज़िन्दगी जीने का हुनर शायद कुछ और ही था.
बड़ी शिद्दत से निभाई थी वफ़ा मगर,
उनके परखने का हुनर शायद और ही था..
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इतना भी न ऐतबार करो कि सदमा सा लगे,
मोहब्बत इतनी भी न करो कि सपना सा लगे ,
आज वक़्त ले आया है उस मोड़ पर,
हर अजनबी जहाँ अपना सा लगे...
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बेताब मुझसे मिलने को क्या वो भी होता है कभी,
एहसास-ऐ-मोहब्बत भी होता है कभी,
सिर्फ सवाल नज़र आता है उसकी आँखों में,
इकरारे -इश्क़ करने का मन क्या उसको भी होता है कभी..
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कोई कोशिश ही नहीं की उसको पाने के लिए,
चला आता हूँ तक़दीर आजमाने के लिए,
उसकी बेरुखी से चोट तो लगती है मगर,
कहाँ है वक़्त रूठने मानाने के लिए। ..
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खामोश हूँ , वक़्त से गुफ़त्गू कर रहा हूँ ,
आईने से आईने को रूबरू कर रहा हूँ,
उम्र के निशां मिटने की कोशिश में ,
आखिरी एक आगोश की जुस्तजू कर रहा हूँ..
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मुश्किलों में हाथ अपनों का छूट जाने दे,
ग़म न कर, साथ परछाइयां तो हैं,
शहर की भीड़ में खामोशियाँ ढूंढने वाले ,
सब्र कर, साथ तन्हाईयाँ जो हैं। . .
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- जनार्दन साबत 'मुरली'