Sunday, September 24, 2017

Tapish..


घिर जाओ कभी अंधेरों में तो  शमा उम्मीद की जलाये रखना,
कि मिल जाती है तपिश दिल की  ठंडक को, दूर के चिराग से भी.... 



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चाहा था एहसाने करम उसका, क्यों कर सितम दे गया,
ख़ुशी बन के आया था, दर्द-ऐ-ज़ख्म दे गया. 

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चाहता मैं भी नहीं था कि दर्द हो किसी को,
एक आह भरी थी,  वो ज़ख्म खा बैठे..  

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गुजर जाने दे ज़िंदगी इसी भरम के साथ,
गुमां  बस इतना रहे, उसने वफ़ा की थी। 

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                                                                - जनार्दन साबत 'मुरली '

Saturday, September 23, 2017

Geet..Mujhe Apni Had ka Pata to Hai...

                                    गीत 


मुझे अपनी हद का पता तो है, पर तेरे दिल की खबर नहीं,
मुझे ज़िन्दगी से गिला है पर मौत की भी फिकर नहीं.

तेरी आरजू, तेरी ज़ुफ्त्जू , तेरी बंदगी मेरी ज़िन्दगी,
मुझे इसका कोई सिला मिले, मेरी आशिकी को फिकर नहीं.

रहा गर्दिशों में ख्याल के, मेरी आरजू का हरेक दिया,
कब ख़त्म होगा ये सफ़र, तुझे इतनी सी भी खबर नहीं.

ज़रा दिल से अपने भी अपने पूछ ले, मेरा आशियाँ क्यों लुट गया,
तेरे दिल में गर कोई और है, तो बता दे कोई फिकर नहीं.

तेरी राह में लुट जाऊंगा, तेरी आस में मिट जाऊंगा,
मुझे इश्क बस अब तुझसे है, क्या तुझको कोई फिकर नहीं? ....


जनार्दन साबत 'मुरली' 

Sher-O-Shayari

शेर   


चुप रहते लब सी लेते तो अच्छा था..
हर ग़म पे मुस्कुरा देते तो अच्छा था.. 
डुबो दी गैर के हाथों, कश्ती अपनी, 
नाखुदा खुद को बनाते तो अच्छा था.. 

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पलट कर देखना भी अब गुनाह लगता है,
यादों को कुरेदना भी अब गुनाह लगता है, 
कुछ आदत सी पद गई है तनहाइयों की,
दोस्तों से मिलना भी अब गुनाह लगता है ..

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कुछ पाने की खुशी कुछ खोने का ग़म,
ज़िन्दगी जीने का हुनर शायद कुछ और ही था. 
बड़ी शिद्दत से निभाई थी वफ़ा मगर,
उनके परखने का हुनर शायद और ही था.. 

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इतना भी  न ऐतबार करो कि सदमा सा लगे,
मोहब्बत इतनी भी न करो कि सपना सा लगे ,
आज वक़्त ले आया है उस मोड़ पर,

हर अजनबी जहाँ अपना सा लगे...  

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बेताब मुझसे मिलने को क्या वो भी होता है कभी,
एहसास-ऐ-मोहब्बत  भी होता है कभी,
सिर्फ सवाल नज़र आता है उसकी आँखों में,
इकरारे -इश्क़ करने का मन क्या उसको भी होता है कभी.. 

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कोई कोशिश ही नहीं की उसको पाने के लिए,
चला आता हूँ तक़दीर आजमाने के लिए,
उसकी बेरुखी से चोट तो लगती है मगर,
कहाँ है वक़्त रूठने मानाने के लिए। .. 

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खामोश हूँ , वक़्त से गुफ़त्गू कर रहा हूँ ,
आईने से आईने को रूबरू कर रहा हूँ,
उम्र के निशां मिटने की कोशिश में ,
आखिरी एक आगोश की जुस्तजू कर रहा हूँ.. 

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मुश्किलों में हाथ अपनों का छूट जाने दे,
ग़म न कर, साथ परछाइयां तो हैं,
शहर की भीड़ में खामोशियाँ ढूंढने वाले  ,
सब्र कर, साथ तन्हाईयाँ जो  हैं। . . 

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                                         - जनार्दन साबत 'मुरली'

Jhuka De Niyati Ko

झुका दे नियति को 


कब से  बैठा है निढाल !

टुकुर टुकुर 
हर आहट को निहारते ,
शब्दहीन साँसों के
बोझ का एहसास लेकर;
रोक ले समय के चक्र को
मूँद ले थकी हारी आँखें 
छोड़ दे साथ 
रूकती चलती असहाय साँसों का;

अथवा 
उठ ! खोल आँखें !
उड़ चल आशाओं के लक्ष्य तक
ले चल पिंजरे का भार पंखों पर
झुका दे नियति को क़दमों पर !


                                                    - जनार्दन साबत 'मुरली'

Niyati.. Destiny

 नियति ...

रास्तों पर निकलकर पहुँच जायेगा 
एक दिन मंजिल तक,
भटकने दो, राही की नियति में 
भटकना लिखा है. 
फडफडा कर थक जाएगा, पिंजरे का हो जाएगा
कुछ ही क्षणों में,
तड़पने दो, पंछी की नियति में 
छटपटाना लिखा है.

उड़ उड़ कर जा गिरेगा जलती ल़ो में
जल जाने दो, पतंगे की नियति में
सुलगना लिखा है.

सूख जाएँगे आंसू भी, बुझेगी जाने कब
मिलन की प्यास,
रो लेने दो, प्रेम की नियति में तड़पना लिखा है.

पोंछ डालो, मांग का सिन्दूर भी निकलेगा
हरजाई एक दिन,
टूट जाने दो, चूड़ियों की नियति में
बिखरना लिखा है.

                                                                      - जनार्दन साबत 'मुरली'