Thursday, September 11, 2014

...वो ग़ज़ल बन गए !



...वो ग़ज़ल बन गए !



अब नया गीत कोई, लिखूँ किस तरह;

वो ग़ज़ल बन के साँसों मे यों बस गए।

 

रात ढलती नहीं सहर के बाद भी,

ख्वाब बन कर निगाहों में वो बस गए ।

 

अब अँधेरों से भी खौफ हमको नहीं,

वो मोहब्बत भरी इक शमां बन गए ।

 

ग़ैर का हो गए, और नज़र फेर ली,

जीते जी लुट गए, जीते जी मर गए ।

 

लौट आएंगे क्या, मुस्कराने के दिन,

फिर मेरे शेर उनपे असर कर गए ।

 

याद करना उन्हें इक इबादत हुई;

रहनुमा बन गए, वो खुदा बन गए ।


- जनार्दन साबत मुरली

 

Sahara Mil Gaya...

 
... ज़िंदगी को एक सहारा मिल गया !
 
उसकी आँखों का इशारा मिल गया,
ज़िंदगी को एक सहारा मिल गया।
 
यूं तो उनको भूलना मुमकिन नहीं,
याद को ताज़ा ठिकाना मिल गया ।
 
मुद्दतों से आस थी मंज़िल मिले,
डूबते को एक किनारा मिल गया ।
 
गैर का वो हमनशी बनकर जिये ,
मुफ़लिसी का एक बहाना मिल गया ।
 
लड़खड़ाते जाम संभले तो लगा,
मय को साक़ी एक पुराना मिल गया ।
 
फिर बहल जाएगा, है मासूम दिल,
आशिकी को फिर दीवाना मिल गया ।
 
-    जनार्दन साबत मुरली