...वो ग़ज़ल बन गए !
अब नया गीत कोई, लिखूँ किस तरह;
वो ग़ज़ल बन के साँसों मे यों बस गए।
रात ढलती नहीं सहर के बाद भी,
ख्वाब बन कर निगाहों में वो बस गए ।
अब अँधेरों से भी खौफ हमको नहीं,
वो मोहब्बत भरी इक शमां बन गए ।
ग़ैर का हो गए, और नज़र फेर ली,
जीते जी लुट गए, जीते जी मर गए ।
लौट आएंगे क्या, मुस्कराने के दिन,
फिर मेरे शेर उनपे असर कर गए ।
याद करना उन्हें इक इबादत हुई;
रहनुमा बन गए, वो खुदा बन गए ।

