Sunday, June 3, 2018




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खामोश हूँ , वक़्त से गुफ़त्गू कर रहा हूँ ,
आईने से आईने को रूबरू कर रहा हूँ,
उम्र के निशां मिटा ने  की कोशिश में ,
एक आखिरी आगोश की जुस्तजू कर रहा हूँ.. 

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मुश्किलों में हाथ अपनों का छूट जाने दे,
ग़म न कर, साथ परछाइयां तो हैं,
शहर की भीड़ में खामोशियाँ ढूंढने वाले ,
सब्र कर, साथ तन्हाईयाँ जो  हैं। . . 

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                                                                               जनार्दन साबत 'मुरली'

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