कुछ बदल कर देखो ......
अपनों से अपनों को मिलाने का ज़रिया बदल कर देखो,
ज़िन्दगी जीने का क्यों न नज़रिया बदल कर देखो..
समंदर खामोश है, दबाये हैं दिल में तूफ़ां कई,
मिल जायेगा कश्ती को किनारा, नाखुदा बदल कर देखो..
तक़दीरें बदलती हैं मेहनत से लकीरों से नहीं ,
जज़्बातों को रहने दो, सोच का दरिया बदल कर देखो...
औरों की क्या, खुद की नहीं सुनता, सरफिरा है वो,
हक़ीक़त से जुड़ो , ख्वाबों की दुनिया बदल कर देखो...
परवरिश शिद्दत से न हो तो गुलशन उजड़ ही जाता है,
मौसमों का क्या कुसूर है, हुज़ूर, बाग़बान बदल कर देखो...
गुज़रा वक़्त नहीं, अपने वजूद में ज़िंदा है वो,
यूं ही कैसे भुला दे दोस्तों को, रुख्सते हवा बदल कर देखो ...
-जनार्दन साबत 'मुरली '
