Tuesday, November 13, 2012

Ek Diwali Aisi Bhi...


एक दीवाली ऐसी भी हो... 
 
चलो आज कुछ ऐसा कर जाएँ 
किसी रूठे हुए को मना आएँ 
गीली पलकों से पोंछकर आँसू 
ज़रा सी हँसी उन होठों को दे आएँ ! 
 
मेरे घर तो दीए जलते हैं , हर दीवाली पर, 
किसी अंधेरे घर को आज रोशन कर आएँ; 
अपने हिस्से की ख़ुशियाँ भला कौन छोड़ देता है, 
इस दीवाली पर किसी भूखे का पेट भर आएँ !
 
आतिशबाज़ी से गूँज रहा है शहर सारा, 
चलो वीरानियों में कुछ किल्कारियाँ बिखेर आएँ!  
बड़ा अकेला हूँ, जुदाई का दर्द समझता हूँ; 
चलो, तन्हाइयों में दोस्ती का रंग भर आएँ! 
 
- जनार्दन साबत 'मुरली'''