खामोश हूँ , वक़्त से गुफ़त्गू कर रहा हूँ ,
आईने से आईने को रूबरू कर रहा हूँ,
उम्र के निशां मिटा ने की कोशिश में ,
एक आखिरी आगोश की जुस्तजू कर रहा हूँ..
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मुश्किलों में हाथ अपनों का छूट जाने दे,
ग़म न कर, साथ परछाइयां तो हैं,
शहर की भीड़ में खामोशियाँ ढूंढने वाले ,
सब्र कर, साथ तन्हाईयाँ जो हैं। . .
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जनार्दन साबत 'मुरली'