Saturday, November 1, 2014

Taajjub Hai...

ताज्जुब है...

कुछ इस क़दर बदला है वक़्त का मिज़ाज़,
शमा को ज़माना जलना सिखा रहा है...।

ताउम्र लड़ा दर्द से बड़ी शिद्दत से जो दिल, 
रेक शख़्श आज उसको सम्भलना सिखा रहा है ।

कुछ इस कदर भुलाता है वो अपनों की यादें,
मौत को ज़िंदगी समझना सिखा रहा है ।

जिनको हर लम्हा मैकशी का खुमार था,
बिन पिये आज हमको चलना सिखा रहा रहा है ।

वो अव्वल था वतन-परश्तों की गिनती में,
ताज्जुब है आज मौत से डरना सिखा रहा है ।

                    -    जनार्दन साबत मुरली