... ज़िंदगी को एक सहारा मिल गया !
उसकी आँखों का इशारा मिल गया,
ज़िंदगी को एक सहारा मिल गया।
यूं तो उनको भूलना मुमकिन नहीं,
याद को ताज़ा ठिकाना मिल गया ।
मुद्दतों से आस थी मंज़िल मिले,
डूबते को एक किनारा मिल गया ।
गैर का वो हमनशी बनकर जिये ,
मुफ़लिसी का एक बहाना मिल गया ।
लड़खड़ाते जाम संभले तो लगा,
मय को साक़ी एक पुराना मिल गया ।
फिर बहल जाएगा, है मासूम दिल,
आशिकी को फिर दीवाना मिल गया ।
- जनार्दन साबत ‘ मुरली ‘

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