एक दीवाली ऐसी भी हो...
किसी रूठे हुए को मना आएँ
गीली पलकों से पोंछकर आँसू
ज़रा सी हँसी उन होठों को दे आएँ !
मेरे घर तो दीए जलते हैं , हर दीवाली पर,
किसी अंधेरे घर को आज रोशन कर आएँ;
अपने हिस्से की ख़ुशियाँ भला कौन छोड़ देता है,
इस दीवाली पर किसी भूखे का पेट भर आएँ !
आतिशबाज़ी से गूँज रहा है शहर सारा,
चलो वीरानियों में कुछ किल्कारियाँ बिखेर आएँ!
बड़ा अकेला हूँ, जुदाई का दर्द समझता हूँ;
चलो, तन्हाइयों में दोस्ती का रंग भर आएँ!
- जनार्दन साबत 'मुरली'''

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