यादें दोस्ती की
लगता था, ज़िन्दगी में बड़ी दूर चला आया हूँ ,
वक़्त को कहीं पीछे छोड़ आया हूँ..
आज मुद्दत बाद दोस्तों से कुछ गुफ़्तगू क्या हुई,
ऐसा लगा फिर से बचपन में लौट आया हूँ..
दिल डरता था , भीड़ में कहीं अकेला तो नहीं रह जाएगा ,
कट्टी नहीं थी दोस्तों से , फिर भी बट्टी करने आया हूँ ..
लगता है, खिल उठेगा फिर वो याराना पुराना ,
उम्र की उछाल का वो मस्त मौला ज़माना ,
याद आने लगा है फिर से वो नन्हे होठों से मुस्कराना,
साथ उठना बैठना, छोटी बातों पर रूठना मनाना ,
वो एक दूजे की खिल्ली उड़ाना, और रोते से हँसाना,
हार पर कोसना दूसरे को, जीत पे मिलकर जश्न मनाना ...
वो स्कूल की मेज पर तस्वीरें बनाकर मिटाना,
कॉपी के पन्ने फाड़कर काग़जी प्लेन उड़ाना..
चित्रहार बनकर फिर आँखों में छलकने लगा है,
ज़िन्दगी को आज वो बचपन फिर अच्छा लगने लगा है.
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कट्टी नहीं थी दोस्तों से , फिर भी बट्टी करने आया हूँ ..
लगता है, खिल उठेगा फिर वो याराना पुराना ,
उम्र की उछाल का वो मस्त मौला ज़माना ,
याद आने लगा है फिर से वो नन्हे होठों से मुस्कराना,
साथ उठना बैठना, छोटी बातों पर रूठना मनाना ,
वो एक दूजे की खिल्ली उड़ाना, और रोते से हँसाना,
हार पर कोसना दूसरे को, जीत पे मिलकर जश्न मनाना ...
वो स्कूल की मेज पर तस्वीरें बनाकर मिटाना,
कॉपी के पन्ने फाड़कर काग़जी प्लेन उड़ाना..
चित्रहार बनकर फिर आँखों में छलकने लगा है,
ज़िन्दगी को आज वो बचपन फिर अच्छा लगने लगा है.
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जनार्दन साबत 'मुरली '

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